Hindi love poetry/poem

"गलियाँ"

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Hindi love poetry/poem

“गलियाँ”

कभी कभी मैं यूँ ही अक़्सर
       निकल पड़ता हूँ टहलने
अपने दिल से तेरे
दिल की गलियोँ में
    न वक्त देखता हूँ न मौक़ा
         न कभी तुमसे इजाज़त माँगी
  के आ जाऊं तुमसे
        मिलने तुम्हारे  दिल की गलियोँ में
न कभी तुमसे पूछना
     जरूरी समझा
   और
      आख़िर जरूरत भी क्या है?
   पूछने की
        तुम कौन सा इंकार करते।

  पर
   मुझे पूछना चाहिए शायद
  आने से पहले
            क्योंकि मैंने अक्सर
महसूस किया है
           तुम्हारे दिल की गलियोँ में
भीड़ बहुत है
          कई बार भटक जाता हूँ मैं
  उस हुज़ूम मे
           एक बेचैनी सी होती है
  उस भीड़ को देख कर
               हाँ! शायद तुम्हें
खो देने का डर होता होगा
वो
      लेकिन खोने का डर तो
                उसका होता हैं न जो
अपने पास हो,
जो खुद का हो
    जिस पर अपना अधिकार हो
और
     अगर तुम मेरे हो !
तुम पर मेरा अधिकार है
तो फिर
    तुम्हारे दिल की गलियोँ में
इतनी भीड़ क्यों है ?
    इन गलियों में आकर क्यों
मैं
   अक्सर भटक जाता हूँ
            भला कोई कैसे खुद के
घर का रास्ता ढूँढने में
           भटक सकता है
मैं
   कभी कभी यूँ ही
       सोचने लगता हूँ कि
वो
     मेरी गलियाँ नहीं है
वो
    एक ऐसा पथ है
           जिस पर मेरे जैसे
कई राहगीर
         चल रहें है
कई
   मुशाफ़िरों के क़दमों
          के निशां तो मुझे कुछ अलग
               से नज़र आते है
मैं
   लाख़ उनको अनदेखा
         करना चाहूँ फिर भी
वो
    नज़र के सामने
           आ ही जाते हैं
    खुद-ब-खुद
और
    मेरा मजाक उड़ाते हुए
          कहते हैं कि
क्यों भाई !
   तुम तो कहते थे
कि ये
         तुम्हारी गलियाँ हैं!
  तुम्हारे
    रास्ते हैं और
तुम ही एक मात्र
मुशाफ़िर
       हो इन गलियों के

  तो फिर
       इस गली में,
        इस राह में
          ये हुज़ूम कैसा ??
                   ये भीड़ कैसी?
ये इतना
          शोर क्यों मचा हुआ है ?
  और
       अगर सच में
ये
       गलियां तुम्हारे लिए
बनाई गयी हैं
    तो
इस गली मे हमारे
              होने के निशान
हमारा
   अस्तित्व अब तक
             मौज़ूद क्यों है ?

अब तक मिटे क्यों नहीं ?
भले
अब हम उस गली में
मौज़ूद न हों
   लेकिन
      हमारे उस गली में होने का
प्रमाण
       क्यों अभी तक
उस गली में मौजूद है?

प्रिये!
तुमने तो कहा था
      ये गली ,
             ये राह क्या
बल्कि
     इस दिल के
               नगर का
पूर्ण स्वामित्व
         तुम्हारा है!!
  तो फिर
        तुम्हारे
नगर के किसी
      एक हिस्से में
कैसे
      क़ोई और अपना
स्थान घेरे बैठा है?

    तुम्ही बताओ प्रिये!
मैं
इन सवालों का क्या
जवाब दूँ?
ये
सवाल कई बार मुझे
      नोचने लगते हैं

सुनो..!!
तुम उस गली
उस
      राह में आने वाले
हर
     व्यक्ति को मना कर दो
और
    उस नगर की
उस
    गली का मालिकाना
             हक़ मुझे दे दो।

वरना
     कई बार मुझे लगता है,
उस
    हुज़ूम को देख कर
उस
    शोर को सुन कर
मानो
     मैं भी उस
गली में सफ़र करने वाला
उन
     ओर राहगीरों की तरह
एक
  साधारण सा
    इन्शाँ हूँ
एक
ऐसा इन्शाँ
    जो उस नगर के
किसी
  एक गली में
किसी
   किराये की
खोली में रहता हैं
और
   एक डर उसके प्राण
लिए जाता है
   कि
   न जाने कब उसे
उस नगर की
   उस गली
में स्थित उस
      खोली से
निकाल दिया जाये,
   बिना बताये
इसलिए
अगर
ये मेरा है तो ,
     मुझे इस नगर का,
उस
गली का या
यूँ कहो
   तुम्हारे
    दिल में बसे
एक-एक नगर का
उन नगरों की
    हर एक
गलियोँ का
   मुझे
एकमात्र,
    इकलौता,
           विशिष्ठ

व्यक्ति घोषित कर दो
  या
   फिर
सरे-आम उस
      साधारण सी
खोली सा
   अवशिष्ट बता कर
मेरा
   भ्रम तोड़ दो

  क्योंकि !
   अब मुझसे
                ओर
                सहा नहीं जाता।।

       “अमित बलूणी “एकांत”
          

 

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