प्रेम का अंकुर

मेरे मन की बगिया के कोने पर

प्रेम का एक नन्हा अंकुर फूटा

ना जाने वो कल्पवृक्ष प्रेम का

क्यों मेरे मन में अंकित हो बैठा

जैसे जन्म – मृत्यु के फेरे से

जन्मों-जन्मों का बंधन हो छूटा

जैसे सावन की रातों में ,काला

बादल घुमड़ घुमड़ कर हो बरसा

सूरज की पहली किरणों से

पुष्प सरोज का खिल उठा हो जैसा

आँखों में अब उसका प्रतिबिब्ब ही है रहता

ना जाने ये प्रेम मेरे हृदय के द्वार कब से खोले है बैठा

 ना जाने वो कल्पवृक्ष प्रेम का

क्यों मेरे मन में अंकित हो बैठा

“मल्हार”

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