Shayari of Kumar Vishwas | कोई दीवाना कहता है (कविता) / कुमार विश्वास

कोई दीवाना कहता है (कविता) / कुमार विश्वास - shayari

कुमार विश्वास शायरी

फ़लक पे भोर की दुल्हन यूँ सज के आई है,
ये दिन उगा है या सूरज के घर सगाई है,
अभी भी आते हैं आँसू मेरी कहानी में,
कलम में शुक्र-ए- खुदा है कि ‘रौशनाई’ है

खुद से भी न मिल सको इतने पास मत होना
इश्क़ तो करना मगर देवदास मत होना
देना , चाहना , मांगना या खो देना
ये सारे खेल है इनमें उदास मत होना !!

आँखें की छत पे टहलते रहे काले साये,
कोई पहले में उजाले भरने नहीं आया…!
कितनी दिवाली गयी, कितने दशहरे बीते,
इन मुंडेरों पर कोई दीप न धरने आया…!!

कोई मंज़िल नहीं जचती सफर अच्छा नहीं लगता
अगर घर लौट भी आऊं तो घर अच्छा नहीं लगता
करू कुछ भी में अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता

कुमार विश्वास के शेर

कुमार विश्वास लेटेस्ट, हिंदी, उर्दू, शायरी, शेर, अशआर, संग्रह के बारे में विस्तार से पढ़ सकते है

गाँव-गाँव गाता फिरता हूँ, खुद में मगर बिन गाय हूँ,
तुमने बाँध लिया होता तो खुद में सिमट गया होता मैं,
तुमने छोड़ दिया है तो कितनी दूर निकल आया हूँ मैं…!!
कट न पायी किसी से चाल मेरी, लोग देने लगे मिसाल मेरी…!
मेरे जुम्लूं से काम लेते हैं वो, बंद है जिनसे बोलचाल मेरी…!!

ये दिल बर्बाद करके, इसमें क्यों आबाद रहते हो
कोई कल कह रहा था तुम अल्लाहाबाद रहते हो.
ये कैसे शोहरते मुझे अता कर दी मेरे मौला
में सब कुछ भूल जाता हु मगर तुम याद रहते हो.

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
हास्य बातो या जज़्बातो मुलाकातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में ये सोचते है सब
ये हंगामे की राते है या है रातो का हंगामा

हमने दुःख के महासिंधु से सुख का मोती बीना है
और उदासी के पंजों से हँसने का सुख छीना है
मान और सम्मान हमें ये याद दिलाते है पल पल
भीतर भीतर मरना है पर बाहर बाहर जीना है।

Kumar Vishwas 2Line Shayri

हर एक नदिया के होंठों पे समंदर का तराना है,
यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है !
वही बातें पुरानी थीं, वही किस्सा पुराना है,
तुम्हारे और मेरे बिच में फिर से जमाना है…!!

कोई खामोश है इतना बहाने भूल आया हु
किसी की एक तरन्नुम में तराने भूल आया हु
मेरी अब राह मत ताकना कभी ऐ आसमा वालो
में एक चिड़िआ की आँखों में उड़ाने भूल आया हु.

पुकारे आँख में चढ़कर तो खू को खू समझता है
अँधेरा किसको कहते है ये बस जुगनू समझता है
हमें तो चाँद तारो में तेरा ही रूप दिखता है
मोहब्बत में नुमाइश को अदाए तू समझता है

महफिल-महफ़िल मुस्काना तो पड़ता है,
खुद ही खुद को समझाना तो पड़ता है
उनकी आँखों से होकर दिल जाना.
रस्ते में ये मैखाना तो पड़ता है..

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